मंदिर कवरेज के बाद विवाद ने पकड़ा तूल, निजता उल्लंघन और मानहानि के आरोप; एफआईआर दर्ज करने की मांग तेज

शिवगंज- शहर में एक धार्मिक स्थल की कवरेज को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कानूनी लड़ाई में बदलता नजर आ रहा है। पत्रकार महेंद्र कुमार माली ने प्रदीप पोरवाल के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए थानाधिकारी बाबूलाल राणा को ज्ञापन सौंपा है, जिसमें एफआईआर दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। ज्ञापन के अनुसार, माली शिवगंज में लंबे समय से सक्रिय पत्रकार हैं और विभिन्न समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों के साथ- साथ अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। मामले की शुरुआत रोहिड़ा वाली वास स्थित प्राचीन सौभाग्य श्री महालक्ष्मी मंदिर से हुई, जहां मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर लगाए गए एक बैनर ने सवाल खड़े कर दिए। बैनर में मंदिर की मूर्ति को अस्थाई रूप से अन्य स्थान पर स्थापित कर भव्य निर्माण का उल्लेख था। धार्मिक परंपराओं के अनुसार स्थापित मूर्ति के स्थान परिवर्तन को लेकर आश्चर्य व्यक्त करते हुए माली ने 11 मार्च को इस विषय पर वीडियो कवरेज कर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित किया। आरोप है कि इस कवरेज के बाद प्रदीप पोरवाल ने फोन कर पत्रकार से संपर्क किया और बातचीत के दौरान अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए सीधे ब्लैकमेलिंग के आरोप लगा दिए। माली का कहना है कि यह वार्तालाप पूरी तरह व्यक्तिगत और गोपनीय था, लेकिन पोरवाल ने बिना अनुमति कॉल रिकॉर्ड कर उसे सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया। पत्रकार का आरोप है कि इस कृत्य से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा है और उन्हें मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा है। उन्होंने इसे निजता का उल्लंघन और मानहानि की श्रेणी में बताते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ई तथा भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज करने की मांग की है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। साथ ही राजस्थान पुलिस के उच्चाधिकारियों द्वारा जारी परिपत्रों का हवाला देते हुए तत्काल कार्रवाई की मांग उठाई गई है। पत्रकार ने प्रशासन से वायरल की गई रिकॉर्डिंग को तुरंत हटवाने और आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की गुहार लगाई है।
*कानून की नजर में कितना गंभीर है मामला*
कानून के जानकार एडवोकेट महेश अग्रवाल के अनुसार, डिजिटल दौर में कॉल रिकॉर्डिंग आम हो गई है, लेकिन किसी की निजी बातचीत को उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को निजता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने कई फैसलों में इसे स्पष्ट रूप से संरक्षित अधिकार माना है।
यदि कोई व्यक्ति निजी कॉल रिकॉर्डिंग को बिना अनुमति प्रसारित करता है, तो यह आईटी एक्ट की धारा 66E के तहत दंडनीय है। वहीं, यदि इससे किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है, तो मानहानि से जुड़ी धाराएं भी लागू हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में पीड़ित को तत्काल पुलिस या साइबर क्राइम सेल में शिकायत दर्ज कर कानूनी कार्रवाई का सहारा लेना चाहिए, साथ ही आपत्तिजनक सामग्री को हटवाने के लिए भी कदम उठाने चाहिए।







